लहरों समान हलचल उठी है,
उन सपनों को पाने खातिर,
जिससे बुना है,मैंने अपना संसार सारा,
चट्टान पर बैठी हुई निहार रही हूं,
मैं अपना मंजिल रुपी किनारा।
पाने हेतु किनारे को,
खुद को नदी में झकझोरना होगा,
सपनों की पूर्ति हेतु,
आरामदायक क्षेत्र छोड़ना होगा।
माना,मुश्किल यह डगर है,
दिल में अगर मगर है,
पर किनारे से पहले आराम नहीं,
रास्ता देख कर डर जाए,
फिर लक्ष्य में बात नहीं।
सपनों को पाने की,
मेहनत रूपी परीक्षा है,
आंखों को अब,
उस किनारे की प्रतीक्षा है,
उस किनारे की प्रतीक्षा है।।
✍️ Kirti chhabra 💗

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