अब काजल नहीं लगाती हूँ ,
आंखों में ।।
तुम्हारे जाने के बाद
जरूरत ही नहीं रही ।।
इन आँखों को काजल की ।।
इसलिए तो इन आँखों ने
काले घेरों को अपना लिया ।।
जानती थी ।।
तुम्हारे जाने के बाद ।।
कौन कहेगा ,
काजल लगाया करो ।।
काजल लगाने से ।।
तुम्हारी बड़ी बड़ी आंखे।।
और भी खूबसूरत हो जाती है ।।
तुम्हें गए ।
एक जमाना हो गया है ।
मैं आज भी तुम्हें जीती हूँ ।
ऐसा नहीं है ।
कोशिश नहीं की तुम्हें भूलने की ।
पर पता नहीं क्यों
तुम किसी फेवीक्विक की तरह
चिपक गए हो ।
मेरी सोच के साथ ।
बहुत चाहा ।
तुम्हारी जगह कोई और लेता ।।
पर शायद ,
इतनी शिद्दत भी नहीं थी किसी में ।।
सच्च ये भी है ,
अब आंसू नहीं बहाती हूँ तुम्हारे लिए ।।
अक्सर खुश हो जाती हूँ ।।
अपनी गाल का तिल देखकर ।।
कभी इसी तिल पर तो ।
तुम खुद को हारे थे।।
सच्च कहूं तो ।।
अब थक जाती हूँ ।
खुद को झूठे आस्वासन देते हुए ।।
फिर भी चलना पड़ेगा ।
अब तो इंतज़ार है सिर्फ
उस आखरी क्षण का ।।
मृत्यु स्वयं बौसे देगी मेरे माथे पर ।।
ले लेगी फिर खुद के आगोश में ।।
बहुत सकूँन होगा ।।
मौत तेरी बुकल में ।।
उठेगा जो चिता से धुआं ।।
वो फिर काजल बन जायेगा ।।
मेरी पथराई आंखों का ।।
तुम्हारे किये तमाम वादे ।।
उग जाएंगे ,
मेरी मृत देह पर तिल बनकर ।।
~ नीना अंदौत्रा
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अब काजल नहीं लगाती हूँ
chinku
September 13, 2020
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