• ऐसा तो इश्क में होता है

    एक शाम जब तुम आये थे
    सूरज डूबा नहीं
    क्षितिज से उगा था
    सितारे निकले नहीं
    जगमगाये थे
    नाचे थे
    बाग़ का बुटा-बूटा
    पत्ता-पत्ता महका था
    हर एक परिन्दा उस रात
    सोया नहीं साथ हमारे जागा था चहका था
    चाँद ने हमें पलकों पर बिठाया था
    चांदनी ने मेरे हाथों की लकीरों से बदनसीबी को मिटाया था
    अंधेरों ने हया के शामयाने बिछाए थे
    वो रात कुछ नायाब थी
    वो चन्द लम्हे
    ज़िन्दगी थी, सदियाँ थी
    या क्या था
    इश्क था, इश्क था, इश्क था
    ऐसा तो फ़क़त इश्क में ही होता है।
                                   ~ प्रेरणा सारवान

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