• सोचता हूं दायरे में आ जाऊं

    हरकतें तो बचकानी हैं ही उनकी
    सोचता हूं कि बस उस दायरे में आ जाऊं
    नींद का क्या है वह तो आएगा ही
    सोचता हूं उनके लिए जगा का जगा रह जाऊं

    मेरे सो जाने और आपका मुझे जगाने से
    आपकी कुछ हरकतें हममें भी आ जाती हैं
    न जाने क्यों अब सब कुछ अच्छा लगता है
    लेकिन उनसे अच्छा तो कुछ भी नहीं लगता

    जब वह में मजाक के मन में हों
    छोटी सी बात पर डांट पड़ सकती है
    सामने डांट कर उनका पीछे से खिलखिलाना
    डांट से भी प्यारा लगता है

    हरकतें तो बचकानी है ही उनकी
    सोचता हूं कि बस उस दायरे में आ जाऊं


  • You might also like

    No comments:

    Post a Comment

Search This Blog

Powered by Blogger.

RECENT COMMENTS