खुशनसीब पहले था मैं
या खुशनसीब अब हो गया
दोस्ती नहीं थी तुमसे
पर अब दोस्त से बढ़कर हो
दोस्ती होती क्या है
मालूम न पहले मुझे
दोस्ती का तरीका और एहसास से
तुमने मुझे वाकिफ कराया
इस दोस्ती से मैंऔर मेरी
यह जिंदगी दोनों मुकम्मल सा हुआ
सोंच नहीं सकता था
कैसी होती मेरी यह जिंदगी
खुशनुमा पल का पता नहीं पर
शायद विरसता से भरपूर होता
पहले न जाने दिन कैसे गुज़रते थे
अब तुम्हें याद न करुं तो ठहर सा जाता
मैं भावनाओं को समझता न था
भावना तो तुमने मुझमें जगाया
मैं अपनी जुबान दबाए रखता था
तुमने मुझे खुली किताब बनाया
छोड़ न जाना किसी मोड़ पर अकेला
वरना अनजान सा वहीं ठहर जाऊंगा
दोनों से बहुत कुछ पाया है मैंने
पाकर अब खोने की मुझमें हिम्मत नहीं
शायद दोनों के बगैर मोम सा बन जाऊं
तुरंत गर्म और फिर पिघल सा जाऊं
तुम्हारी नाराज़गी डरा देती है कभी-कभी
कि कहीं अकेला न कर दे
परंतु तुम्हारी नाराज़गी के बिना ये
दोस्ती भी अधुरी सी लगती है
कभी-कभी सोंचता हुं की एक
किताब लिख डालें इस दोस्ती पर,
पर यह सहज एक ख़्वाब सा है,क्योंकि
एक किताब क्या बया करेगी इस दोस्ती को...
-
मुझे खुली किताब बनाया
chinku
September 13, 2020
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